भोपाल। राजधानी भोपाल में बहुप्रतीक्षित भोपाल मेट्रो रेल सेवा के व्यावसायिक संचालन को करीब एक वर्ष पूरा होने को है, लेकिन यह महत्वाकांक्षी शहरी परिवहन परियोजना गंभीर आर्थिक संकट और यात्रियों के भारी टोटे से जूझ रही है। संचालन और नियमित रखरखाव के बढ़ते खर्च के सामने टिकट बिक्री से होने वाली आय इतनी सीमित है कि मेट्रो के महज एक सप्ताह (7 दिन) के परिचालन का खर्च निकालने में लगभग 100 दिन का समय लग रहा है। दिसंबर 2025 में एम्स (AIIMS) से सुभाष नगर के बीच शुरू हुए 7 किलोमीटर लंबे प्रायोरिटी कॉरिडोर पर यात्रियों को आकर्षित करने में मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन अब तक असफल साबित हुआ है। वहीं, परिचालन घाटे की भरपाई के लिए शुरू किए गए गैर-किराया राजस्व (Non-Fare Revenue) के नवाचार—जैसे कि मेट्रो कोच में बर्थडे पार्टी और प्री-वेडिंग शूट जैसी सेवाएं भी पूरी तरह निष्प्रभावी साबित हुई हैं।
खर्च और कमाई का भारी अंतर: रोजाना ₹5.5 से ₹7 लाख खर्च, टिकटों से नाममात्र वसूली
मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (MPMRCL) के वित्तीय आकलन के अनुसार परियोजना का चालू घाटा चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है:
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सालाना ₹20 से ₹25 करोड़ का खर्च: मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के प्रबंध निदेशक एस. कृष्णा चैतन्य के अनुसार, भोपाल मेट्रो के संचालन और दैनिक रखरखाव (O&M) पर प्रतिवर्ष लगभग ₹20 से ₹25 करोड़ का अनुमानित व्यय आ रहा है।
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हफ्ते का खर्च करीब ₹50 लाख: इस अनुमान के मुताबिक मेट्रो को ट्रैक पर बनाए रखने के लिए रोजाना लगभग ₹5.5 लाख से ₹7 लाख खर्च हो रहे हैं, जो साप्ताहिक आधार पर ₹38 लाख से ₹48 लाख (लगभग ₹50 लाख) तक बैठता है।
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दैनिक यात्री महज 150 से 500: सामान्य कार्यदिवसों (सोमवार से शुक्रवार) में यात्रियों की औसत संख्या 150 से 500 के बीच ही सिमट कर रह जाती है। यदि प्रति यात्री औसत किराया ₹50 भी मान लिया जाए, तो दैनिक टिकट बिक्री से मात्र ₹7,500 से ₹25,000 की ही आय हो पा रही है।
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वीकेंड पर ही थोड़ी राहत: शनिवार और रविवार को मेट्रो को कुछ हद तक रिस्पॉन्स मिलता है, जहां यात्रियों की संख्या 1,000 से 1,500 तक पहुंचती है। परिचालन के शुरुआती दौर (जनवरी) में 15 जनवरी को 275 मुसाफिरों की तुलना में रविवार 18 जनवरी को 1,000 यात्री दर्ज किए गए थे, लेकिन यह उछाल भी विशाल परिचालन लागत की भरपाई के लिए नाकाफी साबित हो रहा है।
सीमित रूट और लास्ट-माइल कनेक्टिविटी का अभाव: उपयोगिता पर उठे सवाल
यात्रियों की बेरुखी की सबसे बड़ी वजह कॉरिडोर का सीमित और अधूरा होना है:
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महज 7 किमी का दायरा: वर्तमान में भोपाल मेट्रो केवल एम्स से सुभाष नगर के बीच 8 स्टेशनों पर संचालित हो रही है। यह रूट शहर के प्रमुख आवासीय इलाकों, मुख्य रेलवे स्टेशन, बस टर्मिनलों और व्यावसायिक बाजारों को आपस में नहीं जोड़ता।
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फेरे बढ़ाए, पर मुसाफिर नहीं बढ़े: कॉर्पोरेशन ने जुलाई के बाद से रोजाना की ट्रिप संख्या 9 से बढ़ाकर 20 तक कर दी, ताकि यात्रियों को कम अंतराल पर ट्रेनें मिल सकें। इसके बावजूद नियमित दैनिक यात्रियों की संख्या में कोई उल्लेखनीय इजाफा दर्ज नहीं किया गया।
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2028 तक ही नेटवर्क विस्तार संभव: अधिकारियों का मानना है कि जब तक मेट्रो का पूरा नेटवर्क करोंद, बैरागढ़ और भोपाल रेलवे स्टेशन जैसे सघन केंद्रों तक नहीं पहुंच जाता, तब तक आम जनता के लिए इसकी उपयोगिता सीमित ही रहेगी। कॉर्पोरेशन के अनुसार नेटवर्क का समग्र विस्तार वर्ष 2028 तक ही पूरा होने की उम्मीद है।
कमाई के वैकल्पिक रास्ते भी बेअसर: ‘सेलिब्रेशन ऑन व्हील्स’ योजना औंधे मुंह गिरी
टिकट के अलावा अन्य माध्यमों से राजस्व जुटाने के लिए बनाए गए मॉडल्स को भी कोई खास रिस्पॉन्स नहीं मिला है:
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मेट्रो में पार्टी की योजना ठप: कॉर्पोरेशन द्वारा 'सेलिब्रेशन ऑन व्हील्स' योजना शुरू की गई थी, जिसके तहत जन्मदिन, किटी पार्टी, प्री-वेडिंग शूट और निजी कार्यक्रमों के लिए कोच और स्टेशनों को किराए पर देने का प्रावधान था। भोपाल में इस योजना को सिर्फ एक बुकिंग मिली थी, जो जून की शुरुआत तक रद्द (Cancel) हो गई। पड़ोसी शहर इंदौर में भी चार हफ्तों में महज दो बुकिंग ही दर्ज की गईं।
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700 पिलरों पर विज्ञापनों का टेंडर: नवंबर 2025 में एलिवेटेड मेट्रो लाइन के 700 से अधिक खंभों (Pillars) पर वाणिज्यिक विज्ञापनों के अधिकार बेचने के लिए टेंडर जारी किए गए थे।
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नए विकल्पों की तलाश: घाटा कम करने के लिए अब प्रबंधन स्टेशनों के सेमी-नेमिंग राइट्स (स्टेशन के नाम के साथ ब्रांड का नाम जोड़ना), कमर्शियल लीज, कोचिंग संस्थानों को स्पेस आवंटन और एटीएम/कियोस्क लगाने जैसे विकल्पों पर नए सिरे से विचार कर रहा है।
मेट्रो को आर्थिक रूप से बेहतर बनाने के लिए क्या करना चाहिए?
पहली प्राथमिकता: फीडर बसें और लास्ट-माइल कनेक्टिविटी
स्टेशन से आसपास की कॉलोनियों, अस्पतालों, कॉलेजों, कार्यालयों और बाजारों तक छोटी बसें, मिनी बसें या निर्धारित ई-रिक्शा सेवाएं उपलब्ध हों। बस और मेट्रो का समय आपस में जुड़ा हो तथा यात्रियों को डिजिटल रूट जानकारी मिले।
दूसरी प्राथमिकता: उपयोगी रूट का तेजी से विस्तार
मेट्रो को रेलवे स्टेशन, प्रमुख बस टर्मिनलों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों से जोड़ना जरूरी है। स्वीकृत कॉरिडोरों का विस्तार समयबद्ध ढंग से हो, लेकिन सुरक्षा, निर्माण गुणवत्ता और लागत नियंत्रण से समझौता न किया जाए।
तीसरी प्राथमिकता: किराया और टिकटिंग में सुविधा
दैनिक यात्रियों, विद्यार्थियों और नियमित कार्यालय जाने वालों के लिए उपयुक्त पास, डिजिटल टिकट और बस-मेट्रो के संयुक्त टिकट की व्यवहार्यता जांची जाए। छूट ऐसी हो कि यात्रियों को लाभ मिले और राजस्व पर उसका प्रभाव भी मापा जा सके।
चौथी प्राथमिकता: हर फेरे की लागत और मांग का आकलन
अलग-अलग समय पर यात्रियों की संख्या, प्रति फेरा खर्च और टिकट आय सार्वजनिक की जाए। कम मांग वाले समय में ट्रेन की आवृत्ति वास्तविक जरूरत के मुताबिक तय हो, लेकिन यात्रियों के लिए सेवा इतनी कम भी न कर दी जाए कि मेट्रो और अनुपयोगी हो जाए।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात है कि टिकट आय और परिचालन खर्च का अंतर बहुत बड़ा है। यदि यही स्थिति बनी रहती है, तो विज्ञापनों या जन्मदिन पार्टियों से मिलने वाली छोटी-मोटी आय पूरे घाटे की भरपाई नहीं कर पाएगी।
साथ ही, परिचालन घाटा और पूरी परियोजना का वित्तीय घाटा अलग-अलग हैं। परिचालन लागत में आम तौर पर ट्रेन चलाना और रखरखाव शामिल होते हैं, जबकि निर्माण लागत, ऋण पर ब्याज और मूल्यह्रास जैसे मद अलग हो सकते हैं।
सरकार को अब क्या करना चाहिए? पांच सुझाव
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90 दिन का सार्वजनिक प्रदर्शन ऑडिट: प्रतिदिन यात्री संख्या, फेरे, टिकट आय, खर्च और प्रति यात्री लागत जारी की जाए।
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स्टेशन-वार फीडर योजना: हर स्टेशन के आसपास की आबादी, प्रमुख संस्थानों और उपलब्ध बस सेवाओं का सर्वेक्षण कर कनेक्टिविटी बढ़ाई जाए।
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गैर-किराया आय के पारदर्शी लक्ष्य: विज्ञापन, दुकानें, ब्रांडिंग और व्यावसायिक किराये से मिलने वाली वास्तविक शुद्ध आय प्रकाशित हो।
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मांग के अनुसार संचालन: यात्रियों की संख्या और ट्रेन की उपलब्धता के आधार पर समय-सारणी बनाई जाए। सिर्फ फेरे बढ़ाना सफलता का प्रमाण नहीं है।
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2028 तक विस्तार की जवाबदेही: निर्माण की समयसीमा, बजट, स्टेशन कनेक्टिविटी और यात्रियों को मिलने वाले लाभ पर नियमित रिपोर्ट जारी हो।
- भोपाल मेट्रो को बंद करना या केवल विज्ञापनों के सहारे चलाना—दोनों ही जल्दबाजी वाले निष्कर्ष होंगे। इसे सफल बनाने के लिए शहर की परिवहन व्यवस्था में इसकी वास्तविक भूमिका तय करनी होगी।
- मेट्रो का पूरा लाभ तब मिलेगा जब लोग घर से स्टेशन तक आसानी से पहुंच सकें, वहां से अपने काम तक जा सकें और उन्हें निजी वाहन के मुकाबले समय, सुविधा या खर्च में वास्तविक फायदा मिले।
- भोपाल को सिर्फ सुंदर मेट्रो नहीं, बल्कि उपयोगी मेट्रो चाहिए। पिलरों पर विज्ञापन राजस्व बढ़ा सकते हैं, स्टेशन पर दुकानें आर्थिक गतिविधि बढ़ा सकती हैं और हरियाली शहर को बेहतर बना सकती है। लेकिन यात्रियों की नियमित संख्या बढ़ाने के लिए मजबूत फीडर नेटवर्क, उपयोगी रूट, बेहतर टिकटिंग और समयबद्ध विस्तार सबसे जरूरी हैं।
- सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि सार्वजनिक धन से बनी इस परियोजना का मूल्यांकन केवल मुनाफे से नहीं, बल्कि नागरिकों को मिलने वाली परिवहन सुविधा, प्रदूषण में संभावित कमी और सड़क यातायात पर पड़ने वाले प्रभाव से भी हो।
भोपाल मेट्रो का मौजूदा संकट यह स्पष्ट करता है कि किसी भी मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (MRTS) की सफलता केवल अत्याधुनिक ट्रेनों और ट्रैक बिछा देने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि उसके लिए संपूर्ण नेटवर्क की कनेक्टिविटी, किफायती किराया और फीडर बसों का सुदृढ़ जाल अनिवार्य होता है। जब तक सुभाष नगर से आगे का विस्तार पूरा नहीं होता और यह लाइन रेलवे स्टेशन तथा पुराने शहर के मुख्य ट्रांजिट हब्स से नहीं जुड़ती, तब तक भोपाल मेट्रो को भारी सरकारी सब्सिडी के सहारे ही पटरी पर बनाए रखना होगा।
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