नई दिल्ली। पति-पत्नी के आपसी विवाद और वैवाहिक कलह के चलते 6 महीने से अधिक की उन्नत गर्भावस्था को समाप्त करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची एक महिला की याचिका पर शीर्ष अदालत ने गहरी चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि बलात्कार, यौन उत्पीड़न या भ्रूण में गंभीर शारीरिक-मानसिक विकार (Fetal Abnormality) की स्थिति में गर्भपात की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन मौजूदा मामला पूरी तरह भिन्न है। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए सवाल किया कि यदि कोई महिला केवल इस आधार पर गर्भपात का फैसला लेने लगे कि पति या ससुराल वालों ने उसके साथ बुरा बर्ताव किया है, तो हम एक समाज के तौर पर किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं? पीठ ने अजन्मे बच्चे पर पिता के अधिकारों को रेखांकित करते हुए महिला से गर्भपात की जिद छोड़ने को कहा, क्योंकि गर्भ में पल रहा भ्रूण चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह स्वस्थ है।

‘गर्भ में पल रहा बच्चा प्यार की निशानी, पिता का भी है हक’: सुप्रीम कोर्ट

शीर्ष अदालत ने दांपत्य जीवन के अंतर्विरोधों और अजन्मे शिशु के जीवन के अधिकार के बीच संतुलन साधते हुए गंभीर टिप्पणियां कीं:

  • सामान्य अनबन गर्भपात का आधार नहीं: पीठ ने याचिकाकर्ता महिला को समझाते हुए कहा कि दांपत्य जीवन में पति-पत्नी के बीच मतभेद और मनमुटाव होना सामान्य बात है, लेकिन केवल इस आधार पर 24 सप्ताह से अधिक के स्वस्थ भ्रूण को समाप्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

  • बलात्कार या सिंगल मदर का मामला नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह किसी यौन उत्पीड़न, अनाचार अथवा किसी अकेली असहाय महिला (Unwed Mother) के गर्भवती होने का प्रकरण नहीं है। यह एक वैध वैवाहिक रिश्ते के भीतर का मामला है, जहां बच्चा दोनों के प्रेम की निशानी है।

  • भ्रूण का पूर्ण स्वास्थ्य: मेडिकल जांच के अनुसार भ्रूण पूरी तरह स्वस्थ और सामान्य रूप से विकसित हो रहा है, ऐसे में गर्भपात की मांग विधिक और नैतिक दोनों दृष्टिकोणों से संवेदनशील व अनुचित है।

पति की दलील: ‘गर्भपात की अनुमति न दी जाए, जन्म के बाद मैं संभालूंगा बच्चा’

याचिका पर सुनवाई के दौरान पति और पत्नी दोनों पक्षों ने अपना-अपना रुख अदालत के समक्ष रखा:

  • महिला की मांग: याचिकाकर्ता महिला ने पीठ से कहा कि वह अब इस रिश्ते को आगे नहीं बढ़ाना चाहती, पति से तलाक लेना चाहती है और इसलिए वह इस गर्भ को भी जारी नहीं रखना चाहती।

  • पिता का प्रतिवाद: इसके विपरीत, पति ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि अजन्मे बच्चे पर उसका भी समान अधिकार है। उसने कोर्ट से गुहार लगाई कि गर्भपात की अनुमति किसी भी स्थिति में न दी जाए।

  • कस्टडी लेने को तैयार: पति ने अदालत को आश्वस्त किया कि बच्चे के जन्म के उपरांत वह उसे पूरी तरह अपने संरक्षण में रखेगा और उसका पालन-पोषण व देखभाल अकेले करने के लिए तैयार है।

सुलह की पहल: पति को चरित्र पर लगाए आरोप वापस लेने और हलफनामा देने का आदेश

अदालत ने मामले की तह में जाते हुए पाया कि वैवाहिक विवाद का मुख्य कारण पति द्वारा महिला के चरित्र पर लगाए गए अनर्गल आरोप थे:

  • आरोप वापस लेने का निर्देश: जस्टिस नागरत्ना की पीठ ने पति से कहा कि यदि वह सचमुच बच्चे और वैवाहिक संबंध को लेकर गंभीर है, तो उसे सुलह की दिशा में पहला कदम उठाना होगा। कोर्ट ने उसे अपने द्वारा पत्नी के चरित्र पर लगाए गए सभी आरोपों को वापस लेने का निर्देश दिया।

  • हलफनामा दाखिल करने का आदेश: अदालत ने पति को निर्देश दिया कि वह एक औपचारिक हलफनामा (Affidavit) दाखिल कर रिकॉर्ड पर कहे कि वह अपने पूर्व के सभी लांछनों और आरोपों को बिना शर्त वापस लेता है।

  • बुधवार को अगली सुनवाई: शीर्ष अदालत ने दोनों पक्षों के तर्कों और हलफनामे के अवलोकन के लिए मामले की अगली सुनवाई आगामी बुधवार को तय की है।

सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट, महिला की शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) और अजन्मे स्वस्थ भ्रूण के जीवन के अधिकार के साथ-साथ पिता के पितृत्व अधिकारों (Father's Rights) के बीच के जटिल कानूनी और नैतिक संतुलन को एक बार फिर विमर्श के केंद्र में ले आई है। शीर्ष अदालत का यह स्पष्ट संदेश है कि वैवाहिक अनबन को अजन्मे और स्वस्थ जीवन को समाप्त करने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता, विशेषकर तब जब दूसरा पक्ष बच्चे की संपूर्ण जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हो।