लखनऊ। वर्ष 2027 के शुरुआती महीनों में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के आए आंकड़ों ने देश के सियासी पारे को गरमा दिया है। निर्वाचन आयोग द्वारा संपन्न कराई गई इस प्रक्रिया के बाद पांचों राज्यों में कुल मतदाताओं की संख्या में 13.24 प्रतिशत तक की शुद्ध गिरावट दर्ज की गई है। इस पूरी कवायद में सबसे बड़ा झटका देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में देखने को मिला है, जहां मतदाता सूची से करीब 2.04 करोड़ नाम शुद्ध रूप से कम हुए हैं, जो पांचों राज्यों में हुई कुल गिरावट का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा है। इन आंकड़ों के सार्वजनिक होते ही विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए ‘वोट चोरी’ के आरोपों को हवा देनी शुरू कर दी है, वहीं सत्ता पक्ष इसे चुनावी हार की अग्रिम हताशा और पारदर्शी मतदाता सूची की अनिवार्यता करार दे रहा है।

राज्यवार आंकड़े: ड्राफ्ट से फाइनल लिस्ट तक का सफर

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत भौतिक सत्यापन, दोहरी प्रविष्टियों (डुप्लीकेट वोटर्स), स्थानांतरित मतदाताओं और मृतकों के नाम हटाने की प्रक्रिया के दौरान ड्राफ्ट और फाइनल लिस्ट में व्यापक उतार-चढ़ाव दर्ज किए गए:

राज्य SIR से पूर्व मतदाता ड्राफ्ट लिस्ट में संख्या फाइनल लिस्ट में संख्या कुल कमी / अंतर प्रतिशत गिरावट
उत्तर प्रदेश 15.44 करोड़ 12.56 करोड़ 13.40 करोड़ -2.04 करोड़ -13.24%
पंजाब 2.15 करोड़ 1.94 करोड़ 2.01 करोड़ -0.14 करोड़ -6.34%
उत्तराखंड 0.80 करोड़ 0.71 करोड़ 0.72 करोड़ -0.08 करोड़ -10.00%
मणिपुर — — 0.196 करोड़ (19.6 लाख) — —
गोवा — — 0.1058 करोड़ (10.58 लाख) — —

उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा फेरबदल: कुल गिरावट का 90% अकेले यूपी से

जनसंख्या और राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची का पुनरीक्षण सबसे नाटकीय रहा:

  • प्रारंभिक चरण में कटे थे 2.88 करोड़ नाम: एसआईआर से पहले यूपी में कुल पंजीकृत मतदाता 15.44 करोड़ थे। ड्राफ्ट सूची प्रकाशित होने पर यह आंकड़ा तेजी से घटकर 12.56 करोड़ पर आ गया था, यानी प्राथमिक जांच में करीब 2.88 करोड़ नाम हटा दिए गए थे।

  • दावे-आपत्तियों के बाद 84 लाख नाम जुड़े: राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) और नागरिकों की ओर से दर्ज कराई गई आपत्तियों के निस्तारण के बाद फाइनल सूची में मतदाताओं की संख्या बढ़कर 13.40 करोड़ पर पहुंची।

  • नेट 2.04 करोड़ का विलोपन: अंतिम प्रकाशन के बावजूद राज्य में शुद्ध रूप से 2.04 करोड़ (13.24%) मतदाता कम हुए हैं। पांच राज्यों में कुल मिलाकर जितने वोटरों के नाम हटे हैं, उनमें से लगभग 90 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले उत्तर प्रदेश की है।

पंजाब में सबसे अधिक नामों की हुई बहाली; उत्तराखंड, मणिपुर व गोवा का हाल

उत्तर प्रदेश के विपरीत, पंजाब में नागरिकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की सक्रियता से हटाए गए नामों की बहाली की दर सबसे अधिक रही:

  • पंजाब में 6.34% की गिरावट: पंजाब में एसआईआर से पहले मतदाताओं की तादाद 2.15 करोड़ थी, जो ड्राफ्ट लिस्ट में गिरकर 1.94 करोड़ रह गई थी। हालांकि, स्क्रूटनी और अपीलों के बाद फाइनल लिस्ट में 7 लाख नाम फिर से जुड़े और अंतिम आंकड़ा 2.01 करोड़ दर्ज हुआ। इस प्रकार पंजाब में शुद्ध कमी 14 लाख (6.34%) की रही।

  • उत्तराखंड में 8 लाख वोटर कम: पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में पुनरीक्षण से पूर्व 80 लाख (0.80 करोड़) मतदाता थे। ड्राफ्ट में यह संख्या घटकर 71 लाख हुई, जिसमें आपत्तियों के बाद आंशिक सुधार हुआ और फाइनल सूची 72 लाख (0.72 करोड़) पर स्थिर हुई।

  • मणिपुर और गोवा की अंतिम स्थिति: पूर्वोत्तर के मणिपुर में अंतिम मतदाता संख्या 19.6 लाख (0.196 करोड़) दर्ज की गई, जबकि तटीय राज्य गोवा में फाइनल मतदाताओं की संख्या 10.58 लाख (0.1058 करोड़) निर्धारित हुई है।

2027 के चुनाव पूर्व सियासी घमासान: ‘वोट चोरी’ बनाम ‘हार का बहाना’

2027 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मतदाता सूची में इतने बड़े पैमाने पर विलोपन ने राजनीतिक दलों के बीच टकराव को चरम पर पहुंचा दिया है:

  • विपक्ष का आक्रामक रुख: विपक्षी दल इसे बड़े स्तर पर मतदाताओं के लोकतांत्रिक अधिकार छीनने की साजिश और कथित ‘वोट चोरी’ का प्रयास बता रहे हैं। विपक्षी गठबंधन द्वारा दिल्ली के रामलीला मैदान में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर को लेकर किए गए शक्ति प्रदर्शन के बाद अब इन राज्यवार आंकड़ों को संसद से लेकर सड़क तक बड़ा हथियार बनाने की तैयारी है।

  • सत्ता पक्ष की दलील: वहीं दूसरी ओर, सत्ता पक्ष का तर्क है कि वर्षों से मतदाता सूचियों में जमे फर्जी नामों, मृतकों, दूसरी जगह स्थायी रूप से बस चुके लोगों (Shifted Voters) और अनधिकृत प्रविष्टियों को हटाना चुनावी शुचिता के लिए अनिवार्य है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि विपक्ष अपनी तयशुदा चुनावी पराजय के लिए पहले से ही चुनाव आयोग और मतदाता सूचियों को ढाल बनाकर बहानेबाजी कर रहा है।

निर्वाचन आयोग के सामने साख बचाने और पारदर्शिता की चुनौती

पांच राज्यों के इन संवेदनशील आंकड़ों के सार्वजनिक होने के बाद भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के प्रशासनिक तंत्र पर भी दोहरी जिम्मेदारी आ गई है:

  • पीलीभीत जैसी गड़बड़ियों की पुनरावृत्ति रोकने की चुनौती: हाल के दिनों में पीलीभीत जैसे क्षेत्रों में जीवित मतदाताओं के नाम कटने या प्रशासनिक लापरवाही से जुड़ी शिकायतों ने विवाद खड़ा किया था। आयोग के लिए यह सुनिश्चित करना अपरिहार्य होगा कि किसी भी वास्तविक और पात्र भारतीय नागरिक का नाम प्रक्रियागत त्रुटि के चलते मताधिकार से वंचित न रह जाए।

  • पारदर्शिता और अपील प्रक्रिया: चुनावी जानकारों का मानना है कि 2027 के चुनावों में उतरने से पहले आयोग को विलोपित किए गए नामों के ठोस आधार (मृत्यु प्रमाण पत्र, फॉर्म-7, स्थायी स्थानांतरण रिकॉर्ड) की सार्वजनिक व डिजिटल पुष्टि करनी होगी, ताकि चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और संवैधानिक विश्वसनीयता पर कोई आंच न आए।