शिमला। हिमाचल प्रदेश में प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन और नए जिले बनाने की दशकों पुरानी मांग को लेकर प्रदेश सरकार ने एक बड़ा नीतिगत कदम उठाया है। राज्य शासन के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा जारी आधिकारिक अधिसूचना के तहत चार सदस्यीय उच्चस्तरीय आयोग का गठन किया गया है। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति धर्म चंद चौधरी की अध्यक्षता में गठित यह आयोग प्रदेश में मौजूदा जिलों, उपमंडलों, तहसीलों और विकास खंडों की व्यापक प्रशासनिक समीक्षा करेगा। आयोग को अपनी विस्तृत सिफारिशें और अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए छह महीने की समयसीमा दी गई है।
आयोग की संरचना: विधि और वन सेवा विशेषज्ञों का समावेश
सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार आयोग की प्रशासनिक रूपरेखा तय की गई है:
- अध्यक्ष: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रिटायर्ड जस्टिस धर्म चंद चौधरी।
- सदस्य: विधिक मामलों के विशेषज्ञ एडवोकेट विशाल पंवार तथा सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी राजेश शर्मा को सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया है।
- सदस्य सचिव: निदेशक भू-अभिलेख (Director of Land Records) को आयोग के सदस्य सचिव का दायित्व सौंपा गया है।
- मुख्यालय एवं प्रशासनिक सहयोग: आयोग का स्थायी मुख्यालय राजधानी शिमला में स्थापित किया गया है। राजस्व विभाग सहित शासन के सभी संबंधित विभागों को आयोग के सुचारू संचालन के लिए आवश्यक अभिलेख, भौगोलिक नक्शे, जनसांख्यिकीय आंकड़े और प्रशासनिक अमला उपलब्ध कराने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।
कार्यक्षेत्र और प्रमुख शर्तें (Terms of Reference): 6 माह में रिपोर्ट
आयोग केवल नए जिले बनाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समूची प्रशासनिक व्यवस्था का पुनर्मूल्यांकन करेगा:
- प्रशासनिक ढांचे की गहन समीक्षा: वर्तमान व्यवस्था के तहत जिलों, उपमंडलों, तहसीलों, उप-तहसीलों और विकास खंडों (Blocks) की उपयोगिता का आकलन किया जाएगा। आयोग यह तय करेगा कि किन क्षेत्रों में नई इकाइयां स्थापित करने की आवश्यकता है और कहां मौजूदा इकाइयों का आपस में विलय (Merger) या पुनर्गठन (Delimitation) किया जाना चाहिए।
- भौगोलिक विषमता और जनता की पहुंच: पर्वतीय राज्य की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, दूरदराज की घाटियों, जनसांख्यिकी और आम नागरिकों की प्रशासनिक मुख्यालयों तक भौतिक पहुंच को सिफारिशों का प्राथमिक आधार बनाया जाएगा।
- राजकोषीय प्रभाव का आकलन: आयोग को विशेष रूप से यह गणना करनी होगी कि नए जिले या उपमंडल सृजित करने से राज्य के खजाने पर कितना वित्तीय बोझ (Fiscal Burden) पड़ेगा और न्यूनतम प्रशासनिक व्यय में कैसे अधिक जन-हितैषी व दक्ष प्रशासन प्रदान किया जा सकता है।
12 जिलों से आगे की राह: पालमपुर, नूरपुर और सुंदरनगर की मांगें प्रमुख
वर्तमान में हिमाचल प्रदेश 12 प्रशासनिक जिलों में विभाजित है, जहां कई क्षेत्रों से वर्षों से अलग जिला बनाने की मांग उठती रही है:
- प्रमुख दावेदार क्षेत्र: कांगड़ा जिले से अलग कर पालमपुर, नूरपुर और देहरा गोपीपुर को जिला बनाने की मांग लंबे समय से प्रमुख राजनीतिक और जनहित का मुद्दा रही है। इसके अतिरिक्त मंडी जिले के सुंदरनगर, शिमला जिले के सुदूर रोहड़ू और कुल्लू के आनी क्षेत्र को स्वतंत्र जिला घोषित करने की मांगें प्रमुखता से उठती रही हैं।
- जनता का मुख्य तर्क: स्थानीय निवासियों और जनसंगठनों का तर्क है कि अत्यधिक विस्तृत और विषम भौगोलिक फैलाव के कारण लोगों को सामान्य प्रशासनिक कामकाज, न्यायालयीन प्रक्रियाओं और प्रमाण-पत्रों के सत्यापन के लिए जिला मुख्यालयों तक 100 से 150 किलोमीटर तक की दुर्गम यात्रा करनी पड़ती है, जिससे उनके समय और धन का भारी अपव्यय होता है।
पर्वतीय राज्य में प्रशासनिक विकेंद्रीकरण को लेकर गठित यह आयोग एक संवेदनशील संतुलन साधने का प्रयास करेगा। जहां एक ओर दूरदराज के क्षेत्रों में शासन की सीधी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए नए जिलों का सृजन अनिवार्य माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सीमित राजस्व संसाधनों वाले राज्य पर नए प्रशासनिक भवनों, अमले और बुनियादी ढांचे के वित्तीय बोझ का प्रबंधन करना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। छह महीने बाद आने वाली आयोग की रिपोर्ट प्रदेश के भावी प्रशासनिक और राजनीतिक नक्शे की दिशा तय करने में निर्णायक साबित होगी।
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