नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से विधायक निर्मला सप्रे की विधानसभा सदस्यता और दल-बदल से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा हस्तक्षेप किया है। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे दो महीने के भीतर नियमानुसार निर्मला सप्रे की सदस्यता पर अंतिम फैसला लें। यह आदेश मध्य प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता उमंग सिंघार द्वारा दायर विशेष याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक मर्यादा और संवैधानिक व्यवस्था में दल-बदल से संबंधित याचिकाओं को अनिश्चितकाल के लिए लंबित नहीं रखा जा सकता।

‘10वीं अनुसूची के मामलों में देरी अस्वीकार्य’: सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता उमंग सिंघार की ओर से राज्यसभा सांसद एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने पैरवी करते हुए विधानसभा अध्यक्ष के स्तर पर निर्णय में हो रहे विलंब का मुद्दा उठाया:

  • समयबद्ध निराकरण की अनिवार्यता: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान दो टूक टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) की मूल भावना यही है कि ऐसे मामलों का निपटारा शीघ्र और पारदर्शी तरीके से हो।
  • हाईकोर्ट के रुख से असहमति: अदालत ने रेखांकित किया कि भले ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस प्रकरण में तात्कालिकता (Urgency) न मानी हो, लेकिन सर्वोच्च अदालत यह मानती है कि चुने हुए प्रतिनिधियों के दल-बदल के मामलों को ठंडे बस्ते में डालना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रतिकूल है। इसी आधार पर विधानसभा अध्यक्ष को 60 दिनों की स्पष्ट समयसीमा दी गई है।

कांग्रेस के टिकट पर जीत और भाजपा में प्रवेश का पूरा घटनाक्रम

निर्मला सप्रे के राजनीतिक कदम को लेकर मध्य प्रदेश की सियासत में लंबे समय से विवाद चल रहा है:

  • 2023 में बीना से जीत: निर्मला सप्रे ने नवंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में सागर जिले की बीना (अजा आरक्षित) सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की थी।
  • लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा में एंट्री: चुनाव जीतने के कुछ ही महीनों बाद, लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान उन्होंने सार्वजनिक मंच से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली थी।
  • सदस्यता रद्द करने की मांग: कांग्रेस पार्टी ने इसे संविधान की 10वीं अनुसूची का खुला उल्लंघन करार देते हुए विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष दल-बदल कानून के तहत उनकी सदस्यता समाप्त (Disqualification) करने के लिए याचिका दायर की थी

स्पीकर के पास सुनवाई पूरी, हाईकोर्ट में सप्रे का विचित्र दावा

विधानसभा सचिवालय के स्तर पर इस मामले में विधिक प्रक्रिया लगभग अंतिम दौर में पहुंच चुकी है:

  • दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत: नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार दल-बदल से जुड़े सभी साक्ष्य, वीडियो फुटेज और औपचारिक दस्तावेज विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के समक्ष पुनः प्रस्तुत कर चुके हैं।
  • सुनवाई की प्रक्रिया संपन्न: विधानसभा अध्यक्ष दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर औपचारिक सुनवाई की प्रक्रिया पहले ही पूरी कर चुके हैं, केवल अंतिम आदेश पारित होना शेष है।
  • ‘मैं कांग्रेस में ही हूं’ का हलफनामा: इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि जहां एक ओर सप्रे भाजपा के कार्यक्रमों में सक्रिय दिखाई दीं, वहीं हाईकोर्ट में दायर अपने औपचारिक जवाब में उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है और वे तकनीकी रूप से कांग्रेस में ही हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश मध्य प्रदेश के संसदीय और राजनीतिक परिदृश्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दो महीने की तय समयसीमा तय हो जाने के बाद अब विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को जनवरी 2027 की शुरुआत से पहले इस बहुचर्चित मामले में विधिक व्यवस्था देनी होगी। यदि निर्मला सप्रे की सदस्यता रद्द होती है, तो सागर जिले की बीना विधानसभा सीट पर उपचुनाव की स्थिति बनेगी, जिससे बुंदेलखंड अंचल की सियासत में एक बार फिर नए समीकरणों का उभार तय है।