भोपाल। मध्य प्रदेश में पुरानी पेंशन बहाली को लेकर लंबे समय से आंदोलनरत शिक्षकों को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ से बड़ी न्यायिक राहत मिली है। हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि जब राज्य सरकार शिक्षकों की पिछली सेवा को मान्य कर उन्हें वरिष्ठता और क्रमोन्नति (Time-Scale Pay) का लाभ दे रही है, तो उन्हें पुरानी पेंशन योजना (OPS) से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की एकल पीठ ने स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा वर्ष 2018 में किए गए संवर्ग संविलियन को 'नई नियुक्ति' मानने के प्रशासनिक तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता शिक्षिका करुणा शर्मा के नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) खाते में जमा समूची धनराशि को तत्काल ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) में ट्रांसफर करने का आदेश दिया है। इस फैसले से प्रदेश के 99 हजार से अधिक अध्यापकों और शिक्षकों के लिए ओपीएस के दायरे में आने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

​‘वरिष्ठता में सेवा मान्य, तो पेंशन में इनकार क्यों?’: कोर्ट की दो टूक

​अदालत ने याचिका की सुनवाई के दौरान सरकार के दोहरे मापदंड पर गंभीर टिप्पणी करते हुए शिक्षकों के विधिक अधिकारों को सुरक्षित किया:

  • ​तर्कसंगतता और समानता का सिद्धांत: पीठ ने रेखांकित किया कि सेवा इतिहास के एक हिस्से को वित्तीय उन्नयन (क्रमोन्नति) और वरिष्ठता निर्धारण के लिए वैध मानना, लेकिन पेंशन निर्धारण के समय उसी सेवा को नजरअंदाज कर देना प्रशासनिक और विधिक दृष्टि से असंगत है।
  • ​2018 का संविलियन नई नियुक्ति नहीं: सरकार ने दलील दी थी कि 2018 में नवीन संवर्ग में संविलियन के बाद यह एक नई सेवा मानी जाएगी, इसलिए वे एनपीएस के ही पात्र हैं। हाईकोर्ट ने इस दलील को निरस्त करते हुए व्यवस्था दी कि संविलियन सेवा की निरंतरता का हिस्सा है, न कि कोई नई भर्ती प्रक्रिया।

​2005 से पहले की मूल नियुक्ति बनाम 2018 संविलियन का विवाद

​विवाद की जड़ में मध्य प्रदेश में पेंशन नियमों की कट-ऑफ तारीख और शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया का इतिहास शामिल रहा है:

  • ​1 जनवरी 2005 की कट-ऑफ: मध्य प्रदेश शासन के नियमों के अनुसार 1 जनवरी 2005 के बाद नियुक्त होने वाले सभी शासकीय सेवकों के लिए पुरानी पेंशन बंद कर नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) अनिवार्य कर दिया गया था।
  • ​शिक्षाकर्मी के रूप में मूल नियुक्ति: प्रदेश के करीब पौने चार लाख शिक्षकों में से 99 हजार से अधिक शिक्षक व अध्यापक ऐसे हैं, जिनकी मूल नियुक्ति वर्ष 1998, 2001 और 2003 के दौरान पंचायत एवं नगरीय निकायों के माध्यम से 'शिक्षाकर्मी' या 'संविदा शाला शिक्षक' के रूप में हुई थी।
  • ​ओपीएस से बाहर रखने का आधार: चूंकि इन शिक्षकों की मूल नियुक्ति 2005 की कट-ऑफ डेट से पहले की थी, वे निरंतर सेवा में रहे। परंतु, 2018 में जब राज्य सरकार ने अध्यापक संवर्ग का स्कूल शिक्षा विभाग में विधिवत संविलियन किया, तब उन्हें नई नियुक्ति का हवाला देकर पुरानी पेंशन से वंचित कर एनपीएस में धकेल दिया गया था। इसी विसंगति के विरुद्ध शिक्षिका करुणा शर्मा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

​NPS फंड को OPS में ट्रांसफर करने के निर्देश: 99 हजार से अधिक परिवारों को राहत

​हाईकोर्ट के इस आदेश के क्रियान्वयन से प्रदेश के शिक्षा जगत पर व्यापक और सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा:

  • ​एनपीएस खाते की राशि होगी स्थानांतरित: अदालत के स्पष्ट निर्देश के बाद अब याचिकाकर्ता सहित समान परिस्थितियों वाले शिक्षकों के एनपीएस प्रान (PRAN) खाते में जमा राशि और उस पर अर्जित ब्याज को सामान्य भविष्य निधि (GPF/OPS व्यवस्था) में समायोजित किया जाएगा।
  • ​99 हजार शिक्षकों पर प्रभाव: वर्तमान में प्रदेश में कार्यरत पौने चार लाख शिक्षकों में से इस विशेष श्रेणी (1998 से 2005 के मध्य नियुक्त) के लगभग 99,000 से अधिक शिक्षक सीधे तौर पर इस फैसले की विधिक परिधि में आते हैं।

​ग्वालियर खंडपीठ का यह फैसला मध्य प्रदेश के अध्यापक संवर्ग के लिए न केवल एक बड़ी नैतिक और विधिक विजय है, बल्कि यह भविष्य में सेवानिवृत्त होने वाले शिक्षकों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा को भी पुख्ता करता है। यदि राज्य सरकार इस फैसले के खिलाफ युगलपीठ (डिवीजन बेंच) में अपील नहीं करती है या वहां भी यह आदेश बरकरार रहता है, तो शासन को 1998-2005 बैच के सभी पात्र शिक्षकों को पुरानी पेंशन के दायरे में लाकर उनके फंड का समायोजन करना होगा।